Alshifa
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  • शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
    ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का
    ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
    साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
    दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
    जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे
    तेरी आंखों के दरिया का उतरना भी जरूरी था
    मोहब्बत भी जरूरी थी, बिछड़ना भी जरूरी था
    कि, हम दोनो तवाफ़-ए-आरज़ू करते
    मगर फिर आरज़ूओं का, बिखरना भी ज़रूरी था
    तेरी आँखों के दरिया का उतरना भी ज़रूरी था
    अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
    अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए
    यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं,
    अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो
    नीचे गिरे सूखे पत्तों पर अदब से चलना ज़रा कभी कड़ी धूप में तुमने इनसे ही पनाह माँगी थी।
    आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की
    दिल को मिटा के दाग़-ए-तमन्ना दिया मुझे ऐ इश्क़ तेरी ख़ैर हो ये क्या दिया मुझे
    आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है
    बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है
    उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए
    फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो
    तुझको इन नींद की तरसी हुई आंखों की कसम अपनी रातों को मेरी हिज्र में बरबाद न कर
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    क्या कहे हुजूर! इस आखों में तेरा ही चेहरा रहता है।
    इश्क़ में जी को सब्र ओ ताब कहाँ उस से आँखें लड़ीं तो ख़्वाब कहाँ
    नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
    यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं, अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो
    तेरे रुखसार पर ढले हैं मेरी शाम के किस्से, खामोशी से माँगी हुई मोहब्बत की दुआ हो तुम
    मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा
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